रायबरेली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) परिसर स्थित वार्ड 6D में बुधवार को एक 55 वर्षीय महिला मरीज की इलाज के दौरान मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद मरीज के परिजनों और अन्य लोगों ने अस्पताल परिसर में हंगामा किया। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए एम्स प्रशासन ने तुरंत हस्तक्षेप किया और मामले पर स्पष्टीकरण जारी किया।
अस्पताल के एडिशनल मेडिकल सुपरिटेंडेंट एवं जनरल सर्जरी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. नीरज श्रीवास्तव ने गुरुवार को आधिकारिक बयान जारी किया। उन्होंने बताया कि भर्ती महिला की हालत अस्पताल लाए जाने के समय से ही अत्यंत चिंताजनक और नाजुक बनी हुई थी।
डॉ. श्रीवास्तव ने मरीज की मेडिकल हिस्ट्री का विवरण देते हुए बताया कि 55 वर्षीय गीता देवी को शनिवार को भर्ती किया गया था। वह लंबे समय से कई गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं, जिनमें थायराइड की समस्या और ‘रूमेटॉइड अर्थराइटिस’ (गठिया) शामिल थे।अर्थराइटिस के इलाज के तहत मरीज को ‘इम्यूनो-सप्रेसेंट’ (प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने वाली) दवाएं दी जा रही थीं।
इन दवाओं के कारण मरीज के शरीर की स्वाभाविक रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) काफी कम हो चुकी थी, जिससे संक्रमण तेजी से फैलने का जोखिम बढ़ गया था।डॉ. नीरज श्रीवास्तव ने बताया कि मरीज के पैर में गंभीर और गहरा संक्रमण (सेप्सिस/नेक्रोटाइजिंग) हो चुका था, जिसमें मवाद भर गया था।
घटती इम्युनिटी के कारण यह संक्रमण धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैल गया और मुख्य अंगों को प्रभावित करने लगा। मेडिकल टीम उन्हें तुरंत वेंटिलेटर/आईसीयू में शिफ्ट करने की तैयारी कर रही थी, लेकिन शरीर में फैले गंभीर संक्रमण और ‘मल्टी-ऑर्गन फेलियर’ (कई अंगों के काम बंद कर देने) की वजह से उन्हें बचाया नहीं जा सका।






















